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धर्म-विशेष

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

*** गोल्ड न्यूज़ नेट परिवार की ओर से  शरद नवरात्रि की ढेर सारी शुभकामनाएं पूरे विश्व में सुख शांति का वातावरण बने माता से हमारा यही प्राथना है जय माता जी की  जय **** 

बस्तर में, नवरात्रि केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है - यह इस क्षेत्र की गहरी सांस्कृतिक पहचान की जीवंत अभिव्यक्ति है। इस उत्सव का मुख्य स्थल पूजनीय दंतेश्वरी मंदिर है, जहाँ देवी दंतेश्वरी के सम्मान में किए जाने वाले अनुष्ठान सदियों पुरानी आदिवासी परंपराओं को दर्शाते हैं।

देवी दुर्गा ने आश्विन के महीने में महिषासुर पर आक्रमण कर उससे नौ दिनों तक युद्ध किया और दसवें दिन उसका वध किया। इसलिए इन नौ दिनों को शक्ति की आराधना के लिए समर्पित कर दिया गया, चूंकि आश्विन मास में शरद ऋतु का प्रारंभ हो जाता है, इसलिए इसे शारदीय नवरात्रि कहा जाता है। शारदीय नवरात्रि के दसवें दिन को विजयदशमी के रूप में मनाया जाता है

11 अक्टूबर 2026 (रविवार):प्रतिपदा तिथि — मां शैलपुत्री पूजा एवं घटस्थापना 

12 अक्टूबर 2026 (सोमवार):द्वितीया तिथि — मां ब्रह्मचारिणी पूजा

  • 13 अक्टूबर 2026 (मंगलवार):तृतीया तिथि — मां चंद्रघंटा पूजा 
  • 14 अक्टूबर 2026 (बुधवार):चतुर्थी तिथि — मां कूष्मांडा पूजा 
  • 15 अक्टूबर 2026 (गुरुवार):पञ्चमी तिथि — मां स्कंदमाता पूजा 
  • 16 अक्टूबर 2026 (शुक्रवार):षष्ठी तिथि — मां कात्यायनी पूजा 
  • 17 अक्टूबर 2026 (शनिवार):सप्तमी तिथि — मां कालरात्रि पूजा 
  • 18 अक्टूबर 2026 (रविवार):अष्टमी तिथि — मां महागौरी पूजा 
  • 19 अक्टूबर 2026 (सोमवार):नवमी तिथि — महानवमी एवं मां सिद्धिदात्री पूजा 
  • 20 अक्टूबर 2026 (मंगलवार):विजयादशमी (दशहरा) एवं प्रतिमा विसर्जन

कलश स्थापना शुभ मुहूर्त - 11 अक्टूबर

प्रथमं शैलपुत्रीति, द्वितीयं ब्रह्मचारिणी ।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति, कूष्मांडीति चतुर्थकम् ।।

पंचमं स्कंदमातेति षष्ठं कात्यायनीतिच ।
सप्तमं कालरात्रिश्च महागौरीतिचाष्टमम् ।।

नवमं सिद्धिदां प्रोक्ता नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः ।
उक्तान्येतानि नामानि, ब्रह्मणैव महात्मना ।।

१. शैलपुत्री, २. ब्रह्मचारिणी ३. चन्द्रघंटा ४. कूष्मांडी (किंवा कुष्मांडी) ५. स्कंदमाता ६. कात्यायनी ७. कालरात्री ८. महागौरी ९. सिद्धिदात्री

शारदीय नवरात्रि के बारे में :-

आश्विन मास में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से प्रारंभ होकर 9 दिन तक चलने वाला नवरात्र 'शारदीय नवरात्र' कहलाता है। 'नव' का शाब्दिक अर्थ नौ है। इसके अतिरिक्त इसे नव अर्थात नया भी कहा जा सकता है।शारदीय नवरात्रों में दिन छोटे होने लगते हैं। मौसम में परिवर्तन प्रारंभ हो जाता है। प्रकृति सर्दी की चादर में सिकुड़ने लगती है। ऋतु के परिवर्तन का प्रभाव जनों को प्रभावित न करे इसलिए प्राचीनकाल से ही इस दिन से 9 दिनों के उपवास का विधान है। नवरात्रों में माता के 9 रूपों की आराधना की जाती है। माता के इन 9 रूपों को हम देवी के विभिन्न रूपों की उपासना, उनके तीर्थों के माध्यम समझ सकते हैं।वर्ष में दो बार नवरात्र रखने का विधान है। चैत्र मास में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से 9 दिन अर्थात नवमी तक और इसी प्रकार ठीक 6 मास बाद आश्विन मास, शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से विजयादशमी से एक दिन पूर्व तक माता की साधना और सिद्धि प्रारंभ होती है। दोनों नवरात्रों में शारदीय नवरात्रों को ज्यादा महत्व दिया जाता है।

हिमालय का एक नाम शैलेंद्र या शैल भी है। शैल मतलब पहाड़, चट्टान। देवी दुर्गा ने पार्वती के रुप में हिमालय के घर जन्म लिया। उनकी मां का नाम था मैना। इसी कारण देवी का पहला नाम पड़ा शैलपुत्री यानी हिमालय की बेटी। मां शैलपुत्री की पूजा, धन, रोजगार और स्वास्थ्य के लिए की जाती है। शैलपुत्री सिखाती है कि जीवन में सफलता के लिए सबसे पहले इरादों में चट्टान की तरह मजबूती और अडिगता होनी चाहिए।

2-ब्रह्मचारिणी का अर्थ है, जो ब्रह्मा के द्वारा बताए गए आचरण पर चले। जो ब्रह्म की प्राप्ति कराती हो। जो हमेशा संयम और नियम से रहे। जीवन में सफलता के लिए सिद्धांत और नियमों पर चलने की बहुत आवश्यकता होती है। इसके बिना कोई मंजिल नहीं पाई जा सकती। अनुशासन सबसे ज्यादा जरूरी है। ब्रह्मचारिणी की पूजा पराशक्तियों को पाने के लिए की जाती है। इनकी पूजा से कई सिद्धियां मिलती हैं।

ये देवी का तीसरा रूप है, जिसके माथे पर घंटे के आकार का चंद्रमा है, इसलिए इनका नाम चंद्रघंटा है। ये देवी संतुष्टि की देवी मानी जाती है। जीवन में सफलता के साथ शांति का अनुभव तब तक नहीं हो सकता है, जब तक कि मन में संतुष्टि का भाव ना हो। आत्म कल्याण और शांति की तलाश जिसे हो, उसे मां चंद्रघंटा की आराधना करनी चाहिए।

कुष्मांडा देवी का चौथा स्वरूप है। ग्रंथों के अनुसार इन्हीं देवी की मंद मुस्कार से अंड यानी ब्रह्मांड की रचना हुई थी। इसी कारण इनका नाम कूष्मांडा पड़ा। ये देवी भय दूर करती हैं। भय यानी डर ही सफलता की राह में सबसे बड़ी मुश्किल होती है। जिसे जीवन में सभी तरह के भय से मुक्त होकर सुख से जीवन बिताना हो, उसे देवी कुष्मांडा की पूजा करनी चाहिए।

भगवान शिव और पार्वती के पहले पुत्र हैं कार्तिकेय, उनका ही एक नाम है स्कंद। कार्तिकेय यानी स्कंद की माता होने के कारण देवी के पांचवें रुप का नाम स्कंद माता है। उसके अलावा ये शक्ति की भी दाता हैं। सफलता के लिए शक्ति का संचय और सृजन की क्षमता दोनों का होना जरूरी है। माता का ये रूप यही सिखाता है और प्रदान भी करता है।