भगवान विष्णु जी के सुदर्शन चक्र की कहानी
बहुत समय पहले जब पृथ्वी पर असुरों का अत्याचार बढ़ गया था, तब देवता अत्यंत चिंतित हो गए। दैत्य अपनी शक्ति के बल पर धर्म का नाश कर रहे थे और निर्दोष लोगों को कष्ट पहुँचा रहे थे। तब सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में पहुँचे और उनसे संसार की रक्षा करने की प्रार्थना की।
भगवान विष्णु ने देवताओं की बात सुनी लेकिन वे जानते थे कि इन शक्तिशाली असुरों का अंत करने के लिए उन्हें एक ऐसे दिव्य अस्त्र की आवश्यकता है जो अजेय हो। इसके लिए उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या करने का निश्चय किया। भगवान विष्णु ने हिमालय की पवित्र भूमि पर बैठकर भगवान शिव का ध्यान किया और हजार कमलों से उनकी पूजा करने का संकल्प लिया। जब पूजा पूर्ण होने वाली थी तब भगवान शिव ने उनकी भक्ति की परीक्षा लेने के लिए एक कमल छिपा दिया।
विष्णुजी ने जब कमलों की गिनती की तो एक कमल कम निकला। वे अपने संकल्प को अधूरा नहीं छोड़ना चाहते थे। उनकी आँखें कमल के समान सुंदर थीं, इसलिए उन्हें कमलनयन भी कहा जाता था। भगवान विष्णु ने निश्चय किया कि वे कमल के स्थान पर अपनी एक आँख भगवान शिव को अर्पित कर देंगे। जैसे ही वे अपनी आँख निकालने लगे, भगवान शिव उनकी अद्भुत भक्ति और समर्पण से प्रसन्न होकर प्रकट हो गए। उन्होंने विष्णुजी को रोक लिया और कहा कि उनकी भक्ति से वे अत्यंत संतुष्ट हैं। तब शिवजी ने उन्हें एक दिव्य, तेजस्वी और अजेय अस्त्र प्रदान किया, जिसे सुदर्शन चक्र कहा गया। यह चक्र इतनी तीव्र गति से घूमता था कि कोई भी शत्रु इससे बच नहीं सकता था। सुदर्शन चक्र प्राप्त करने के बाद भगवान विष्णु ने अनेक दैत्यों का संहार किया और धर्म की रक्षा की। तभी से सुदर्शन चक्र भगवान विष्णु का प्रमुख आयुध माना जाता है। यह केवल एक हथियार नहीं, बल्कि धर्म न्याय सत्य और ईश्वरीय शक्ति का प्रतीक है, जो सदैव अधर्म का विनाश कर धर्म की स्थापना करता है।


