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राष्ट्रीय

देश में नक्सलियों का सूर्यास्त.....

नरेन्द्र कुमार वर्मा

दिव्यदूत ब्यूरो चीफ नई दिल्ली

नई दिल्ली 02/04/2026 /// देश में दशकों पुराने लाल सलाम का आतंक अब अतीत की बात बन गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दृढ़ इच्छा शक्ति और गृहमंत्री अमित शाह के ऑपरेशन प्रहार से देश के कई हिस्सों में पनपा वामपंथी उग्रवाद समूल नष्ट हो चुका है। देश के बिहारझारखंडपश्चिम बंगालमहाराष्ट्रतेलंगानाछत्तीसगढ़ओडिशाआंध्रप्रदेश और केरलम राज्य में पनपे नक्सलवाद की गहरी जड़ों को सुरक्षा बलों के उखाड़ फेंका। साल 2024 में केंद्र सरकार ने नक्सलवाद के खात्मे का संकल्प लिया था। इस दौरान हथियार डालने वाले लोगों के पुनर्वास और उन्हें अच्छी जिंदगी देने का वादा सरकार ने किया था। गृहमंत्री अमित शाह ने स्वयं ऑपरेशन प्रहार की कमान संभाल रखी थी और उन्होंने कहा था कि मार्च 2026 तक देश नक्सलवाद से मुक्त हो जाएगा।

दरअसल देश के 36 जिलों में लंबे अरसे आदिवासियों और भोले-भाले लोगों को बरगला कर वामपंथी विचारधारा वाले लोगों ने नक्सलवादी मूवमेंट छेड़ रखा था। एक समय हालात यह थे कि देश में 9400 वर्ग किलोमीटर लंबे जंगली इलाकों में नक्सली वाहनों से टैक्स वसूले थे और जंगलों की कमती उपज को हथिया कर खुले बाजार में बेच कर पैसा एकत्र करते थे। देश में 1200 किलोमीटर लंबे रेड कॉरिडोर वाले इलाके में बहुत पढ़े-लिखे लोगों के हाथों में नक्सलवादी आंदोलन की बोगडार थी। सुरक्षाबलों को मार कर उनके हथियार लूटनासरकारी दफ्तरों और रेलवे ट्रैक को तोड़ डालनाजंगलों में काम करने वाले ठेकेदारों से 30 प्रतिशत कर कमीशन वसूलना और राजनेताओं की हत्या कर अपनी मांगों को मनवाने जैसे जन विरोधी कामकाज करते हुए नक्सलियों ने खूब खौफ पैदा किया।

1967 में नक्सलवादी आंदोलन का आरंभ पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी गांव से हुआ था। नेपाल की सीमा से सटे तराई के इस गांव में किसानों और आदिवासियों ने मिलकर स्थानीय जमींदारों के खिलाफ विद्रोह कर दिया था। कहा जाता है कि आदिवासियों और किसानों को चारु मजूमदार और कानू सान्याल जैसे वामपंथी नेताओं ने भड़काया था। 1969 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया ने इस आंदोलन की आग में घी डालने का काम किया और सरकार के खिलाफ सशस्त्र क्रांति को अपना खुला समर्थन दिया। धीरे-धीरे वामपंथी नेताओं ने जंगलों में रहने वाले भोले-भाले आदिवासियों के बीच रह कर उन्हें सरकार और स्थानीय प्रशासन के खिलाफ खड़ा कर दिया। जंगलों में आदिवासी युवकों को सरकार और सुरक्षाबलों के खिलाफ शस्त्रों का प्रशिक्षण देना आरंभ किया। पश्चिम बंगाल से होता हुआ यह आंदोलन बिहारझारखंड, ओडिशाआंध्रप्रदेशमहाराष्ट्रमध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के जंगलों में फैलता गया। देश के दस से ज्यादा राज्यों में फैले नक्सलवादी नेटवर्क ने एक समय में अपनी समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी कर ली और अपने लड़ाकों को मासिक वेतन देना आरंभ किया। 

नक्सलियों के शीर्ष नेताओं ने आदिवासियों को सरकार के खिलाफ खड़ा कर दिया। मगर जल्दी भोले-भाले आदिवासियों ने महसूस किया कि जिस भेदभाव और शोषण के खिलाफ उन्होंने हथियार उठाए थे वह छलावा था। उन्होंने अपने ही लोगों की हत्या करने से इनकार कर दिया। जंगलों में जीवन बिताने वाले आदिवासी युवक और युवतियों ने भी समाज की मुख्यधारा में शामिल होकर सामान्य जीवन बिताने का फैसला किया।

केंद्र सरकार ने नक्सलवाद से प्रभावित इलाकों में अस्पतालस्कूलसरकारी आवासखेती की सुविधापेयजल, बिजलीरोजगारशिल्पकला को बढ़ावा और युवक-युवतियों को सुरक्षाबलों में भर्ती करके उनके विश्वास को जीतने का काम किया। बस्तर और अबूझमाड़ के जिन जंगलों को नक्सलियों का अभेद दुर्ग कहा जाता था वहां के शीर्ष कमांडर मल्लोजुला वेणुगोपाल राव उर्फ अभय उर्फ भूपति उर्फ सोनू ने एक भावुक और आत्ममंथन भरा पत्र लिखकर अपने साथियों से हथियार डाल कर मुख्यधारा में शामिल होने को कहा। भूपति के पत्र से पूर्व भी छत्तीसगढ़ की स्पेशल जोनल कमेटी के तीन प्रमुख सदस्यों ने महाराष्ट्रमध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर आत्म समर्पण की इच्छा जताई थी। दरअसल केंद्र सरकार ने देश के नक्सल प्रभावित इलाकों में बुढ़ा थंडरस्टॉर्मप्रहार और ब्लैक फॉरेस्ट नाम से ऑपरेशन संचालित कर रखे थे। जिसके सामने नक्सलियों की भूमिका सिमटती जा रही थी । सरकार ने नक्सली बने लोगों के परिवार वालों को मुख्यधारा से जोड़ कर उन्हें बहुत सारी सुविधाएं प्रदान करने का काम किया। बहुत से परिजनों के आव्हान पर उनके बेटे-बेटियों ने जंगल का रास्ता छोड़ कर सरकार के सामने आत्म समर्पण करने का फैसला किया। ऑपरेशन प्रहार के तहत सुरक्षाबलों ने 300 से अधिक बड़े नक्सली शिविरो को नष्ट कर बड़ी संख्या में गोला बारूद बरामद किया।

35-40 महिनों तक केंद्र सरकार के दिशा निर्देश में सीआरपीएफ ने कई राज्यों में नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशन को तेज कर दिया। बेहतर खुफिया तंत्र और आधुनिक तकनीकी के सहारे सुरक्षाबलों को उनके हर मूवमेंट की सटिक जानकारी मिलती रही। चारों तरफ से दवाब पड़ता देखकर 9 हजार से ज्यादा नक्सलियों ने सुरक्षाबलों के सामने हथियार डाल दिए। सरकार ने भी हाथों हाथ उनके पुनर्वास का काम किया। आज बहुत सारे नौजवान स्वरोजगार अपना कर अच्छा पैसा कमा रहे है। बहुत सारी युवतियों ने सिलाईब्यूटीपार्लररेस्टोरेंटसुरक्षा गार्ड और खेती किसानी का प्रशिक्षण लेकर अपना जीवन संवारना आरंभ कर दिया है। कल तक जिन नौजवानों के कंधों पर बंदूक टंगी थी उनके हाथ में आज स्मार्ट फोन है। उन्हें इलेक्ट्रीशियनड्राइविंगखेल कोच और कुक का प्रशिक्षण देकर सरकार ने एक मुश्त पुनर्वास राशि देकर आत्म निर्भर बनाने का काम किया है। नक्सल प्रभावित जिन क्षेत्रों में कभी कदम-कदम पर लाल झंडा दिखाई देता था वहां आज तिरंगा लहरा रहा है।

केंद्र सरकार ने भी अपनी बातों पर अमल करते हुए आत्मसमर्पित नक्सलियों का विश्वास जीतने का काम किया है। बस्तर फाइटर्स योजना के तहत पूर्व नक्सलियों को सुरक्षा बलों में शामिल करके देश सेवा के काम से जोड़ा जा रहा है। दुर्गम गांवों तक सरकार ने सड़कबिजली, पानीस्कूल और खेती की सुविधाओं को पहुंचा कर लोगों का दिल जीतने का काम किया है। बीते 35 वर्षों से खूनी खेल खेलने वाले नक्सली आंदोलन को खत्म करना कोई आसान काम नहीं था। मगर केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने देश को यह भरोसा दिया कि मार्च 2026 तक नक्सली आंदोलन पूरी तरह से समाप्त हो जाएगा। इस चुनौती को गृहमंत्री अमित शाह ने पूरा किया। वह लगातार सुरक्षाबलों के शीर्ष अधिकारियों के साथ संपर्क में रहे और उन्हें हर तरह की सुविधाएं और विशेष फंड देने का काम किया। सुरक्षा बलों ने फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस बना कर ड्रोन निगरानीइंटेलिजेंसआधुनिक हथियारों का प्रयोग,बख्तरबंद वाहनों का इस्तेमाल और सप्लाई चेन को तोड़कर आत्म समर्पण करने वालों को सुरक्षा देने जैसी रणनीति को अपना कर इस ऑपरेशन को पूर्ण किया। 

सरकार को अब नक्सल प्रभावित क्षेत्रों को पर्यटनयात्राजड़ी-बूटी और धार्मिक मान्यताओं वाले क्षेत्रों के तौर पर विकसित करने की दिशा में काम करना चाहिए। इससे बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार प्राप्त होगा और पर्यटक इन क्षेत्रों में कुछ दिन बिताने के लिए आएंगे। सरकार को इन क्षेत्रों में स्थानिय भाषा के विकास और आदिवासियों के पर्व त्योहारों के लिए प्रचार-प्रसार का काम भी करना चाहिए। शिक्षारोजगार, आधुनिक संसाधनों का विकास और जंगलों की रक्षा जैसे जरूरी कामों पर भी सरकार को गंभीरता से काम करना होगा। नक्सल मुक्त भारत का सपना तभी पूरा हो सकता है जब स्थानिय स्तर पर वहां राष्ट्रीय विचारों का प्रचार-प्रसार हो और विकास में स्थानिय आदिवासी समाज की सतत भागिदारी सुनिश्चित की जाए।